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mahabharat 5.61.15: जहाँ कहीं भी मैं किसी कार्य के लिए बहुत सी अक्षौहिणी सेनाओं के साथ जाता हूँ, वहाँ मेरे घोड़े मेरी इच्छा से (बिना किसी बाधा के) विचरण करते हैं।॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 5.61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.61.15 
अक्षौहिणीभिर्यान् देशान् यामि कार्येण केनचित्।
तत्राश्वा मे प्रवर्तन्ते यत्र यत्राभिकामये॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जहाँ कहीं भी मैं किसी कार्य के लिए बहुत सी अक्षौहिणी सेनाओं के साथ जाता हूँ, वहाँ मेरे घोड़े मेरी इच्छा से (बिना किसी बाधा के) विचरण करते हैं।॥ 15॥
 
Wherever I go with a large number of Akshauhini armies for some purpose, my horses move about at my will (without hindrance).॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)