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mahabharat 5.61.12-13: यहाँ तक कि जो महान् और भयानक तूफान अथवा कोलाहलपूर्ण ओलावृष्टि इस चर-अचर जगत् को नष्ट करने वाली प्रतीत होती है, उसे भी मैं समस्त प्राणियों पर दया करके यहीं सबके सामने शांत कर सकता हूँ॥ 12-13॥   |   mahabharat अध्याय 5.61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  5.61.12-13 
चेतनाचेतनस्यास्य जङ्गमस्थावरस्य च।
विनाशाय समुत्पन्नमहं घोरं महास्वनम्॥ १२॥
अश्मवर्षं च वायुं च शमयामीह नित्यश:।
जगत: पश्यतोऽभीक्ष्णं भूतानामनुकम्पया॥ १३॥
 
 
अनुवाद
यहाँ तक कि जो महान् और भयानक तूफान अथवा कोलाहलपूर्ण ओलावृष्टि इस चर-अचर जगत् को नष्ट करने वाली प्रतीत होती है, उसे भी मैं समस्त प्राणियों पर दया करके यहीं सबके सामने शांत कर सकता हूँ॥ 12-13॥
 
Even a great and terrifying storm or a noisy hailstorm that appears to destroy the living and non-living, mobile and immobile world, I can, by showing mercy to all creatures, calm it down right here in front of everyone.॥ 12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)