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mahabharat 5.61.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अपने पिता के ये वचन सुनकर अत्यन्त असहिष्णु दुर्योधन मन ही मन अत्यन्त क्रोधित हो उठा और पुनः इस प्रकार बोला -॥1॥   |   mahabharat अध्याय 5.61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.61.1 
वैशम्पायन उवाच
पितुरेतद् वच: श्रुत्वा धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षण:।
आधाय विपुलं क्रोधं पुनरेवेदमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अपने पिता के ये वचन सुनकर अत्यन्त असहिष्णु दुर्योधन मन ही मन अत्यन्त क्रोधित हो उठा और पुनः इस प्रकार बोला -॥1॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing these words of his father, the extremely intolerant Duryodhan became very angry within and said again like this -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)