श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 60: धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका तुलनात्मक वर्णन  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  5.60.22-23 
क्षयोदयोऽयं सुमहान् कुरूणां प्रत्युपस्थित:।
अस्य चेत् कलहस्यान्त: शमादन्यो न विद्यते॥ २२॥
शमो मे रोचते नित्यं पार्थैस्तात न विग्रह:।
कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान् शक्तिमत्तरान्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
‘यह कौरवों के लिए महाविनाश का समय है। पिताश्री! यदि इस युद्ध को समाप्त करने के लिए संधि के अतिरिक्त और कोई उपाय न हो, तो मैं सदैव संधि को ही प्राथमिकता देता हूँ; कुन्तीपुत्रों के विरुद्ध युद्ध करना उचित नहीं है। मैं सदैव पाण्डवों को कौरवों से अधिक शक्तिशाली मानता हूँ।’॥22-23॥
 
‘This is a time of great destruction for the Kauravas. Father! If there is no other way to end this conflict except a treaty, then I always prefer a treaty; it is not right to wage war against the sons of Kunti. I always consider the Pandavas to be more powerful than the Kauravas.'॥ 22-23॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रविवेचने षष्टितमोऽध्याय:॥ ६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका विवेचनसम्बन्धी साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं।]
 
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