Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.60.12-20: ‘जिनके पास उत्तम एवं भयंकर दिव्य गांडीव धनुष है, वरुण द्वारा दिए गए बाणों से भरे हुए दो दिव्य अक्षय तरकश हैं, जिनकी दिव्य वानर ध्वजा कहीं भी नहीं अटकती, जो धुएँ के समान अविराम गति से सर्वत्र जा सकते हैं, जिनके रथ के समान समुद्र पर्यन्त समस्त पृथ्वी पर कोई दूसरा रथ नहीं है, जिनकी गर्जना महान मेघों की गर्जना के समान सभी को सुनाई देती है और जो शत्रु सैनिकों के हृदय में वज्र की गर्जना के समान भय उत्पन्न करती है, जिन्हें सभी लोग असाधारण पराक्रमी मानते हैं, जिन्हें सभी राजा भी युद्ध में देवताओं को भी परास्त करने में समर्थ मानते हैं, जो हाथ में पाँच सौ बाण लेकर पलक झपकते ही उन्हें छोड़ देते हैं और दूर स्थित लक्ष्यों पर भी प्रहार करते हैं; किन्तु जिन्हें यह सब करते हुए कोई देख नहीं सकता; जिनके विषय में भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ लोग भी कहते हैं कि युद्ध के लिए खड़े हुए शत्रुओं में श्रेष्ठ अर्जुन को परास्त करना अमानवीय बल वाले भूमिपालों के लिए भी असंभव है। जो एक ही वेग से पाँच सौ बाण चलाते हैं और जो बाहुबल में कार्तवीर्य अर्जुन के समान हैं; मैं उन महाधनुर्धर पाण्डुनंदन अर्जुन को, जो इन्द्र और विष्णु के समान पराक्रमी हैं, इस महासमर में शत्रु सेनाओं का संहार करते हुए देख रहा हूँ॥12-20॥ | mahabharat अध्याय 5.60: धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका तुलनात्मक वर्णन । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
‘जिनके पास उत्तम एवं भयंकर दिव्य गांडीव धनुष है, वरुण द्वारा दिए गए बाणों से भरे हुए दो दिव्य अक्षय तरकश हैं, जिनकी दिव्य वानर ध्वजा कहीं भी नहीं अटकती, जो धुएँ के समान अविराम गति से सर्वत्र जा सकते हैं, जिनके रथ के समान समुद्र पर्यन्त समस्त पृथ्वी पर कोई दूसरा रथ नहीं है, जिनकी गर्जना महान मेघों की गर्जना के समान सभी को सुनाई देती है और जो शत्रु सैनिकों के हृदय में वज्र की गर्जना के समान भय उत्पन्न करती है, जिन्हें सभी लोग असाधारण पराक्रमी मानते हैं, जिन्हें सभी राजा भी युद्ध में देवताओं को भी परास्त करने में समर्थ मानते हैं, जो हाथ में पाँच सौ बाण लेकर पलक झपकते ही उन्हें छोड़ देते हैं और दूर स्थित लक्ष्यों पर भी प्रहार करते हैं; किन्तु जिन्हें यह सब करते हुए कोई देख नहीं सकता; जिनके विषय में भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ लोग भी कहते हैं कि युद्ध के लिए खड़े हुए शत्रुओं में श्रेष्ठ अर्जुन को परास्त करना अमानवीय बल वाले भूमिपालों के लिए भी असंभव है। जो एक ही वेग से पाँच सौ बाण चलाते हैं और जो बाहुबल में कार्तवीर्य अर्जुन के समान हैं; मैं उन महाधनुर्धर पाण्डुनंदन अर्जुन को, जो इन्द्र और विष्णु के समान पराक्रमी हैं, इस महासमर में शत्रु सेनाओं का संहार करते हुए देख रहा हूँ॥12-20॥
‘Who has the finest and fierce divine Gandiva bow, two divine inexhaustible quivers filled with arrows given by Varuna, whose divine monkey flag does not get stuck anywhere, who can go everywhere with unstopped speed like smoke, whose chariot has no other chariot comparable to him on the entire earth up to the sea, whose thundering sound is heard by everyone like the roar of great clouds and strikes fear in the hearts of enemy soldiers like the thunder of thunder, whom everyone considers to be of extraordinary prowess, whom even all kings consider capable of defeating even the gods in battle, who takes five hundred arrows in his hand and releases them in the blink of an eye and hits even distant targets; but whom no one can see while doing all this; Regarding which Bhishma, Drona, Kripacharya, Ashwatthama, Madraraj Salya and even neutral people say that it is impossible even for the Bhumipalas having inhuman strength to defeat Arjuna, the best of the enemies who has stood up for the war. Who shoots five hundred arrows at one speed and who is like Kartavirya Arjuna in strength of arms; I am seeing that great archer Pandu Nandan Arjuna, who is as mighty as Indra and Vishnu, destroying the enemy armies in this great battle. 12-20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥