श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 6: द्रुपदका पुरोहितको दौत्यकर्मके लिये अनुमति देना तथा पुरोहितका हस्तिनापुरको प्रस्थान  » 
 
 
अध्याय 6: द्रुपदका पुरोहितको दौत्यकर्मके लिये अनुमति देना तथा पुरोहितका हस्तिनापुरको प्रस्थान
 
श्लोक 1:  राजा द्रुपद ने (पुरोहित से) कहा- पुरोहित! समस्त भूतों में जीव श्रेष्ठ हैं। जीवों में बुद्धिजीवी श्रेष्ठ हैं। बुद्धिमान प्राणियों में मनुष्य और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ माने गए हैं। 1॥
 
श्लोक 2:  ब्राह्मणों में विद्वान्, विद्वानों में तत्त्वों को जानने वाले, तत्त्वों को जानने वालों में तद्नुसार आचरण करने वाले तथा उनमें भी श्रेष्ठ वे हैं जो ब्रह्म को जानते हैं। 2.
 
श्लोक 3:  मैं मानता हूँ कि आप तत्त्वज्ञों में श्रेष्ठ हैं। आपका वंश तो श्रेष्ठ है ही, आयु और शास्त्र-ज्ञान में भी आप श्रेष्ठ हैं॥3॥
 
श्लोक 4:  आपकी बुद्धि शुक्राचार्य और बृहस्पति के समान है। आप दुर्योधन के आचरण और विचारों से भली-भाँति परिचित हैं।॥4॥
 
श्लोक 5:  कुन्तीपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर के आचरण और विचार भी आपसे छिपे नहीं हैं। धृतराष्ट्र की जानकारी से शत्रुओं ने पाण्डवों के साथ छल किया है। 5॥
 
श्लोक 6-7h:  विदुर के अनुरोध के बावजूद, धृतराष्ट्र अपने पुत्र के पीछे चले गए। शकुनि स्वयं जुआ खेलने में निपुण थे, और यह जानते हुए कि युधिष्ठिर जुआरी नहीं, बल्कि क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले शुद्धात्मा पुरुष हैं, उन्होंने उन्हें समझा-बुझाकर जुआ खेलने के लिए बुलाया।
 
श्लोक 7-8h:  इन सबने मिलकर धर्मराज युधिष्ठिर के साथ छल किया है। अब वे किसी भी हालत में उन्हें राज्य नहीं लौटाएँगे।
 
श्लोक 8-9h:  परन्तु राजा धृतराष्ट्र से धर्मपूर्ण वचन बोलकर तुम उनके योद्धाओं का हृदय अपनी ओर अवश्य मोड़ लोगे।
 
श्लोक 9-10h:  वहाँ विदुर जी भी तुम्हारी बातों का समर्थन करेंगे और तुम भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदि में मतभेद उत्पन्न करोगे ॥9 1/2॥
 
श्लोक 10-11h:  जब मंत्रियों में फूट पड़ जाए और योद्धा पीठ फेर लें, तब उनका (मुख्य) कार्य पुनः नई सेना एकत्रित करना और संगठित करना होगा।
 
श्लोक 11-12h:  इस बीच, कुंती का पुत्र, अपने मन को एकाग्र करके, आसानी से सेना का संगठन करेगा और सामग्री एकत्र करेगा। 11 1/2
 
श्लोक 12-13h:  जब हमारे सम्बन्धी वहाँ उपस्थित होंगे और तुम भी वहाँ रहकर लौटने में विलम्ब करते रहोगे, तब निःसंदेह वे सेना को एकत्र करने का कार्य ठीक प्रकार से नहीं कर सकेंगे ॥12 1/2॥
 
श्लोक 13-14h:  आपके वहाँ जाने का मुख्य उद्देश्य यही प्रतीत होता है। यह भी सम्भव है कि आपके संग से धृतराष्ट्र का मन बदल जाए और वे आपके धर्मसम्मत वचनों को स्वीकार कर लें।॥13 1/2॥
 
श्लोक 14-16h:  आप धर्मात्मा हैं, अतः धर्मानुसार आचरण करते हुए कौरवकुल के दयालु वृद्धजनों को पूर्वजों द्वारा पालन किए जाने वाले कुलधर्म और पाण्डवों के कष्टों का वर्णन कीजिए। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि आप इस प्रकार उनका मन दुर्योधन से हटा देंगे। ॥14-15 1/2॥
 
श्लोक 16-17h:  तुम्हें उनसे कोई भय नहीं है, क्योंकि तुम वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण हो। तुम दूतों के कार्य के लिए विशेष रूप से नियुक्त किए गए हो और वृद्ध हो।
 
श्लोक 17:  अतः आप पुष्य नक्षत्र से युक्त जय नामक शुभ समय में कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर के कार्य की सिद्धि के लिए शीघ्र ही कौरवों के पास जाएँ॥17॥
 
श्लोक 18:  वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! महामना राजा द्रुपद द्वारा इस प्रकार अनुशासित होकर धर्मात्मा पुरोहित हस्तिनापुर चले गये।
 
श्लोक 19:  वे नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र के विद्वान और विशेषज्ञ थे। वे पाण्डवों के कल्याण के लिए अपने शिष्यों के साथ कौरवों की राजधानी की ओर गए थे। 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)