श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 59: संजयका धृतराष्ट्रके पूछनेपर उन्हें श्रीकृष्ण और अर्जुनके अन्त:पुरमें कहे हुए संदेश सुनाना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.59.21 
अर्थांस्त्यजत पात्रेभ्य: सुतान् प्राप्नुत कामजान्।
प्रियं प्रियेभ्यश्चरत राजा हि त्वरते जये॥ २१॥
 
 
अनुवाद
‘तुम सुपात्रों को धन दान करो, अपनी इच्छानुसार पुत्र उत्पन्न करो और अपने प्रियजनों के इच्छित कार्य संपन्न करो; क्योंकि राजा युधिष्ठिर अब तुम सबको जीतने के लिए अधीर हो रहे हैं॥ 21॥
 
‘You should donate wealth to deserving people, beget sons according to your wishes and accomplish the desired tasks of your loved ones; because King Yudhishthira is now impatient to conquer you all.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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