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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 59: संजयका धृतराष्ट्रके पूछनेपर उन्हें श्रीकृष्ण और अर्जुनके अन्त:पुरमें कहे हुए संदेश सुनाना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  5.59.15-16 
इन्द्रकेतुरिवोत्थाय सर्वाभरणभूषित:।
इन्द्रवीर्योपम: कृष्ण: संविष्टो माभ्यभाषत॥ १५॥
वाचं स वदतां श्रेष्ठो ह्लादिनीं वचनक्षमाम्।
त्रासिनीं धार्तराष्ट्राणां मृदुपूर्वां सुदारुणाम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, इन्द्र के समान पराक्रमी, समस्त आभूषणों से विभूषित तथा वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने इन्द्र के ध्वज के समान खड़े होकर पहले तो मुझसे मधुर तथा उपदेश योग्य मधुर वाणी में कहा, फिर वह वाणी अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके प्रकट हुई, जो आपके पुत्रों के लिए भय उत्पन्न करने वाली थी।
 
Thereafter, Shri Krishna, who was as powerful as Indra and adorned with all ornaments and was the best among speakers, stood up like Indra's flag and first spoke to me in a soft and pleasing voice suitable for discourse. Then that voice appeared in a very dreadful form, which was going to create fear for your sons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)