श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 58: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.58.8 
येषु सम्प्रतितिष्ठेयु: कुरव: पीडिता: परै:।
ते युद्धं नाभिनन्दन्ति तत् तुभ्यं तात रोचताम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं से पीड़ित होने पर कौरव सैनिक जिनकी शरण में खड़े हो सकते हैं, वे ही लोग युद्ध को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हे प्रिये! आपको भी उनका यह दृष्टिकोण अच्छा लगना चाहिए॥8॥
 
The very people in whose refuge the Kaurava soldiers can stand when they are suffering from the enemies are not approving of the war. O dear! You should also like this view of theirs.॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)