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वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा राजा तु सर्वांस्तान् पृथिवीपतीन्।
अनुभाष्य महाराज पुन: पप्रच्छ संजयम्॥ २९॥
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - महाराज जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र ने वहाँ बैठे हुए सब राजाओं को उपर्युक्त बातें समझाकर फिर संजय से पूछा।
Vaishmpayana says - Maharaja Janamejaya! King Dhritarashtra explained the above mentioned things to all the kings sitting there and then asked Sanjaya again.
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्येऽष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥