श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 58: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.58.17 
त्यक्तं मे जीवितं राज्यं धनं सर्वं च पार्थिव।
न जातु पाण्डवै: सार्धं वसेयमहमच्युत॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे राजन, मैं अपना जीवन, राज्य, धन-सब कुछ त्याग सकता हूँ, परन्तु पाण्डवों के साथ कभी नहीं रह सकता।
 
O King who cannot be dethroned, I can give up my life, kingdom and wealth - everything, but I can never live with the Pandavas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)