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mahabharat 5.58.14: हे मनुष्यों के स्वामी! इस यज्ञ में हम यमराज का पूजन करके शत्रुओं का संहार करके विजय की देवी से विभूषित होकर अपनी राजधानी को लौटेंगे।॥14॥   |   mahabharat अध्याय 5.58: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 58: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.58.14 
आत्मयज्ञेन नृपते इष्ट्वा वैवस्वतं रणे।
विजित्य च समेष्यावो हतामित्रौ श्रिया वृतौ॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! इस यज्ञ में हम यमराज का पूजन करके शत्रुओं का संहार करके विजय की देवी से विभूषित होकर अपनी राजधानी को लौटेंगे।॥14॥
 
O lord of men! After worshipping Lord Yamaraja in this yajna of ours, we will kill our enemies and return to our capital victorious, adorned with the goddess of victory. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)