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mahabharat 5.58.13: उसमें रथ ही वेदी है, तलवार ही धनुष है, गदा ही भाला है, कवच ही मृगचर्म है, रथ का भार उठाने वाले चार घोड़े मेरे चार हैं, बाण ही कुशा हैं और यश ही हवि है ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 5.58: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 58: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.58.13 
रथो वेदी स्रुव: खड्गो गदा स्रुक् कवचोऽजिनम्।
चातुर्होत्रं च धुर्या मे शरा दर्भा हविर्यश:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
उसमें रथ ही वेदी है, तलवार ही धनुष है, गदा ही भाला है, कवच ही मृगचर्म है, रथ का भार उठाने वाले चार घोड़े मेरे चार हैं, बाण ही कुशा हैं और यश ही हवि है ॥13॥
 
In it the chariot itself is the altar, the sword is the bow, the mace is the spear, the armour is the deerskin, the four horses that bear the load of the chariot are my four, the arrows are the kusha grass and fame is the offering. ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)