vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 5: उद्योग पर्व
»
अध्याय 58: धृतराष्ट्रका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना, दुर्योधनका अहंकारपूर्वक पाण्डवोंसे युद्ध करनेका ही निश्चय तथा धृतराष्ट्रका अन्य योद्धाओंको युद्धसे भय दिखाना
»
श्लोक 12
श्लोक
5.58.12
अहं च तात कर्णश्च रणयज्ञं वितत्य वै।
युधिष्ठिरं पशुं कृत्वा दीक्षितौ भरतर्षभ॥ १२॥
अनुवाद
तात! भरतश्रेष्ठ! मैंने और कर्ण ने युद्धभूमि का विस्तार किया है और युधिष्ठिर को यज्ञ का पशु बनाकर यज्ञ का आरम्भ किया है ॥12॥
Tat! Bharatshrestha! I and Karna have expanded the battlefield and have initiated the yagya by making Yudhishthira a sacrificial animal. 12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×