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mahabharat 5.57.62: गाण्डीव धनुष धारण करने वाले पराक्रमी अर्जुन का दिव्य रथ देवताओं द्वारा सुरक्षित है। उसे कोई भी मनुष्य पराजित नहीं कर सकता, इसलिए तुम अपने मन को युद्ध की ओर प्रवृत्त न होने दो॥॥ 62॥   |   mahabharat अध्याय 5.57: संजयद्वारा पाण्डवोंकी युद्धविषयक तैयारीका वर्णन, धृतराष्ट्रका विलाप, दुर्योधनद्वारा अपनी प्रबलताका प्रतिपादन, धृतराष्ट्रका उसपर अविश्वास तथा संजयद्वारा धृष्टद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 57: संजयद्वारा पाण्डवोंकी युद्धविषयक तैयारीका वर्णन, धृतराष्ट्रका विलाप, दुर्योधनद्वारा अपनी प्रबलताका प्रतिपादन, धृतराष्ट्रका उसपर अविश्वास तथा संजयद्वारा धृष्टद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  5.57.62 
देवैर्हि सम्भृतो दिव्यो रथो गाण्डीवधन्वन:।
न स जेयो मनुष्येण मा स्म कृढ्ध्वं मनो युधि॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
गाण्डीव धनुष धारण करने वाले पराक्रमी अर्जुन का दिव्य रथ देवताओं द्वारा सुरक्षित है। उसे कोई भी मनुष्य पराजित नहीं कर सकता, इसलिए तुम अपने मन को युद्ध की ओर प्रवृत्त न होने दो॥॥ 62॥
 
The divine chariot of the valiant Arjuna, who wields the Gandiva bow, is protected by the gods. No human can defeat him, so do not let your minds be drawn towards war.'॥ 62॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)