श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 57: संजयद्वारा पाण्डवोंकी युद्धविषयक तैयारीका वर्णन, धृतराष्ट्रका विलाप, दुर्योधनद्वारा अपनी प्रबलताका प्रतिपादन, धृतराष्ट्रका उसपर अविश्वास तथा संजयद्वारा धृष्टद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  5.57.54-55 
भवता यद् विधातव्यं तन्न: श्रेय: परंतप।
संग्रामादपयातानां भग्नानां शरणैषिणाम्॥ ५४॥
पौरुषं दर्शयञ्शूरो यस्तिष्ठेदग्रत: पुमान्।
क्रीणीयात् तं सहस्रेण इति नीतिमतां मतम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
परंतु आप जो कुछ करेंगे, वह हमारे लिए मंगलमय होगा। जो वीर पुरुष युद्धभूमि से भागे हुए पराजित शरणागत सैनिकों के सामने खड़ा होकर अपना पराक्रम दिखाता है (और उनका भय दूर करता है), उसे हजारों रुपये धन देकर भी खरीदा जा सकता है (अपने पक्ष में लाया जा सकता है); ऐसा बुद्धिमान पुरुषों का मत है। ॥54-55॥
 
But whatever you do will be auspicious for us. The brave man who displays his valour and stands in front of the defeated refugee soldiers who have fled from the battlefield (and removes their fear), can be bought (brought to your side) even by giving thousands of rupees of wealth; this is the opinion of wise men. ॥ 54-55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)