तथा ब्रुवन्तं धर्मात्मा प्राह राजा युधिष्ठिर:।
तव धैर्यं च वीर्यं च पञ्चाला: पाण्डवै: सह॥ ५१॥
सर्वे समधिरूढा: स्म संग्रामान्न: समुद्धर।
जानामि त्वां महाबाहो क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम्॥ ५२॥
समर्थमेकं पर्याप्तं कौरवाणां विनिग्रहे।
पुरस्तादुपयातानां कौरवाणां युयुत्सताम्॥ ५३॥
अनुवाद
धृष्टद्युम्न से इस प्रकार कहते हुए धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर बोले - 'हे महारथी! पाण्डवों सहित समस्त पांचाल योद्धा आपके धैर्य और पराक्रम का आश्रय लेकर युद्ध के लिए उद्यत हैं, अतः आप ही हमें इस संग्राम से बचाएँ। मैं जानता हूँ कि आप क्षत्रिय धर्म में स्थित हैं और युद्ध की इच्छा से आगे आए हुए समस्त कौरवों को पकड़ने की पूर्ण शक्ति आपमें है।॥ 51-53॥
Speaking thus to Dhrishtadyumna, the righteous king Yudhishthira said, 'O mighty warrior! All the Panchala warriors including the Pandavas have taken shelter of your patience and valour and are ready for the war, therefore you alone must save us from this conflict. I know that you are established in the Kshatriya Dharma and you have the full power to capture all the Kauravas who have come forward with the desire to fight.॥ 51-53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥