श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 57: संजयद्वारा पाण्डवोंकी युद्धविषयक तैयारीका वर्णन, धृतराष्ट्रका विलाप, दुर्योधनद्वारा अपनी प्रबलताका प्रतिपादन, धृतराष्ट्रका उसपर अविश्वास तथा संजयद्वारा धृष्टद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन  »  श्लोक 44-45h
 
 
श्लोक  5.57.44-45h 
जानाति हि यथा भीष्म: पाण्डवानां यशस्विनाम्।
बलवत्तां सपुत्राणां धर्मज्ञानां महात्मनाम्॥ ४४॥
यतो नारोचयदयं विग्रहं तैर्महात्मभि:।
 
 
अनुवाद
भीष्मजी भली-भाँति जानते हैं कि धर्म में निपुण और महान यशस्वी पाण्डव अपने पुत्रों सहित कितने पराक्रमी हैं। इसीलिए उन महापुरुषों के विरुद्ध युद्ध करने का विचार उन्हें अच्छा नहीं लगा॥44 1/2॥
 
Bhishmaji knows very well how powerful the great Pandavas, who are experts in Dharma and have great fame, along with their sons are. That is why he did not like the idea of ​​waging war against those great men. ॥ 44 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)