श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 57: संजयद्वारा पाण्डवोंकी युद्धविषयक तैयारीका वर्णन, धृतराष्ट्रका विलाप, दुर्योधनद्वारा अपनी प्रबलताका प्रतिपादन, धृतराष्ट्रका उसपर अविश्वास तथा संजयद्वारा धृष्टद्युम्नकी शक्ति एवं संदेशका कथन  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  5.57.37-38 
पितामहं च द्रोणं च कृपं कर्णं च दुर्जयम्।
जयद्रथं सोमदत्तमश्वत्थामानमेव च॥ ३७॥
सुतेजसो महेष्वासानिन्द्रोऽपि सहितोऽमरै:।
अशक्त: समरे जेतुं किं पुनस्तात पाण्डवा:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
तात! पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्जय वीर कर्ण, जयद्रथ, सोमदत्त और अश्वत्थामा, ये सभी श्रेष्ठ एवं तेजस्वी धनुर्धर हैं। देवताओं सहित इन्द्र भी इन्हें युद्ध में नहीं हरा सकते; फिर पाण्डवों की तो बात ही क्या है? 37-38॥
 
Tat! Grandfather Bhishma, Dronacharya, Kripacharya, Durjay Veer Karna, Jayadratha, Somdutt and Ashwatthama, all of them are excellent and brilliant archers. Even Indra along with the gods cannot defeat them in battle; Then what is the matter of Pandavas? 37-38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)