श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 55: धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  5.55.67 
गुणहीनं परेषां च बहु पश्यामि भारत।
गुणोदयं बहुगुणमात्मनश्च विशाम्पते॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
हे भरत! हे प्रजानाथ! मैं देखता हूँ कि शत्रुओं का बल हमारी अपेक्षा अनेक प्रकार से न्यून (न्यूनतम) है, परन्तु मेरा अपना बल सब प्रकार से बहुत अधिक और अधिक पुण्यमय है ॥67॥
 
Bharata! O Prajanatha! I see that the strength of the enemies is inferior in many ways (minimal) compared to ours, but my own strength is much greater and more virtuous in every way. ॥ 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)