श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 55: धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  5.55.56 
तस्य शक्त्योपगूढस्य कस्माज्जीवेद् धनंजय:।
विजयो मे ध्रुवं राजन् फलं पाणाविवाहितम्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
उस अमोघ शक्ति से सुरक्षित कर्ण के विरुद्ध युद्ध करने पर अर्जुन कैसे जीवित रह सकेगा ? हे राजन ! मैं हाथ में रखे हुए फल के समान निश्चय ही विजय प्राप्त करूँगा ॥ 56॥
 
How can Arjuna survive when he comes to fight against Karna who is protected by that infallible power? O King! I shall certainly achieve victory like a fruit held in the hand. ॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)