श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 55: धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  5.55.54 
अनुज्ञातश्च रामेण मत्समोऽसीति भारत।
कुण्डले रुचिरे चास्तां कर्णस्य सहजे शुभे॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
भरत! कर्ण को (शिक्षा देकर घर लौटने के लिए) आदेश देते समय परशुराम ने कहा था कि तुम (अस्त्र-विद्या में) मेरे समान हो। इसके अतिरिक्त कर्ण को जन्म के समय दो सुन्दर एवं शुभ कुण्डल प्राप्त हुए थे।
 
Bharat! While ordering Karna (to return home after imparting education), Parshuram had said that you are equal to me (in the knowledge of weapons). Apart from this, Karna had received two beautiful and auspicious earrings at the time of his birth. 54.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)