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mahabharat 5.55.14: (मैं सोचता हूँ,) इस समय प्रणाम करने में कोई हानि नहीं है। इससे हम दोनों में सदा के लिए शांति हो जाएगी। मैं तो केवल अपने बुद्धिमान पिता महाराज धृतराष्ट्र के लिए शोक कर रहा हूँ।॥14॥   |   mahabharat अध्याय 5.55: धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 55: धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.55.14 
प्रणिपाते न दोषोऽस्ति सन्धिर्न: शाश्वती: समा:।
पितरं त्वेव शोचामि प्रज्ञानेत्रं जनाधिपम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
(मैं सोचता हूँ,) इस समय प्रणाम करने में कोई हानि नहीं है। इससे हम दोनों में सदा के लिए शांति हो जाएगी। मैं तो केवल अपने बुद्धिमान पिता महाराज धृतराष्ट्र के लिए शोक कर रहा हूँ।॥14॥
 
‘(I think,) there is no harm in bowing down at this time. This will bring peace between us forever, I am only grieving for my wise father Maharaja Dhritarashtra.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)