श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 55: धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.55.11 
तत्र किं प्राप्तकालं न: प्रणिपात: पलायनम्।
प्राणान् वा सम्परित्यज्य प्रतियुध्यामहे परान्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
ऐसी स्थिति में इस समय हमारा क्या कर्तव्य है? क्या हम उनके चरणों पर गिरकर, पीठ दिखाकर भाग जाएँ अथवा प्राणों की आसक्ति त्यागकर शत्रुओं का सामना करें?॥11॥
 
‘In such a situation, what is our duty at this time? Should we fall at his feet, turn our backs and run away or face the enemies giving up our attachment to life?॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)