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mahabharat 5.51.25: पितामह! भीमसेन एक दुर्गम और विशाल सागर है। उसे पार करने के लिए कोई नाव नहीं है, न ही उसकी गहराई ज्ञात है; उसकी गति केवल बाण है। फिर भी मेरा मूर्ख पुत्र भीमसेन से भरे इस दुर्गम सागर को पार करना चाहता है।   |   mahabharat अध्याय 5.51: भीमसेनके पराक्रमसे डरे हुए धृतराष्ट्रका विलाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 51: भीमसेनके पराक्रमसे डरे हुए धृतराष्ट्रका विलाप  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.51.25 
अपारमप्लवागाधं समुद्रं शरवेगिनम्।
भीमसेनमयं दुर्गं तात मन्दास्तितीर्षव:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
पितामह! भीमसेन एक दुर्गम और विशाल सागर है। उसे पार करने के लिए कोई नाव नहीं है, न ही उसकी गहराई ज्ञात है; उसकी गति केवल बाण है। फिर भी मेरा मूर्ख पुत्र भीमसेन से भरे इस दुर्गम सागर को पार करना चाहता है।
 
Father! Bhimsena is an inaccessible and vast ocean. There is no boat to cross it and neither is it known its depth; its speed is only the arrow. Still my foolish son wants to cross this inaccessible ocean full of Bhimsena.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)