श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 49: भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुन: उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  5.49.30-31h 
किं चान्यन्मयि दुर्वृत्तं येन मां परिगर्हसे।
न हि मे वृजिनं किंचिद् धार्तराष्ट्रा विदु: क्वचित्॥ ३०॥
नाचरं वृजिनं किंचिद् धार्तराष्ट्रस्य नित्यश:।
 
 
अनुवाद
मुझमें ऐसा क्या दोष है कि तुम मेरी आलोचना कर रहे हो? ऐसा नहीं है कि महाराज धृतराष्ट्र के पुत्रों ने कभी मेरे किसी पाप को देखा या जाना हो। मैंने दुर्योधन का कभी कोई अहित नहीं किया। 30 1/2
 
What is the wrongdoing in me that you are criticizing me? It is not the case that the sons of Maharaja Dhritarashtra have ever seen or known of any of my sins. I have never done any harm to Duryodhan. 30 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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