श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  5.48.95 
न चेदिदं कर्म नरेन्द्र वन्ध्यं
न चेद् भवेत् सुकृतं निष्फलं वा।
इदं च तच्चाभिसमीक्ष्य नूनं
पराजयो धार्तराष्ट्रस्य साधु:॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! यदि मनुष्य के पाप व्यर्थ नहीं जाते अथवा पुण्य कर्म बिना फल के नहीं रहते, तो दुर्योधन के वर्तमान और पूर्व पापों का विचार करके मैं निश्चयपूर्वक कह ​​सकता हूँ कि धृतराष्ट्रपुत्र की पराजय अवश्यंभावी है और इसी में जगत का कल्याण है॥95॥
 
O King! If the sins of a man do not go in vain or the good deeds do not remain without their fruits, then after considering the present and past sins of Duryodhan, I can say with certainty that the defeat of Dhritarashtra's son is inevitable and this is for the good of the world.॥ 95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)