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mahabharat 5.48.93: यदि धृतराष्ट्र के पुत्र इन्द्र आदि देवताओं की सहायता से भी हमें युद्ध में पराजित कर दें, तो हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि पापकर्म, पुण्यकर्मों से अधिक महत्वपूर्ण हैं तथा इस संसार से पुण्यकर्म निश्चित रूप से लुप्त हो गए हैं।   |   mahabharat अध्याय 5.48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  5.48.93 
ते चेदस्मान् युध्यमानाञ्जयेयु-
र्देवैर्महेन्द्रप्रमुखै: सहायै:।
धर्मादधर्मश्चरितो गरीयां-
स्ततो ध्रुवं नास्ति कृतं च साधु॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
यदि धृतराष्ट्र के पुत्र इन्द्र आदि देवताओं की सहायता से भी हमें युद्ध में पराजित कर दें, तो हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि पापकर्म, पुण्यकर्मों से अधिक महत्वपूर्ण हैं तथा इस संसार से पुण्यकर्म निश्चित रूप से लुप्त हो गए हैं।
 
"If the sons of Dhritarashtra defeat us in the war even with the help of the gods like Indra, then we will have to accept that sinful acts are more important than righteous acts and that virtuous acts have certainly vanished from this world." 93.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)