श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 81-82
 
 
श्लोक  5.48.81-82 
न तं देवा: सह शक्रेण शेकु:
समागता युधि मृत्योरभीता:।
दृष्ट्वा च तं विक्रमं केशवस्य
बलं तथैवास्त्रमवारणीयम्॥ ८१॥
जानन्तोऽस्य प्रकृतिं केशवस्य
न्ययोजयन् दस्युवधाय कृष्णम्।
स तत् कर्म प्रतिशुश्राव दुष्कर-
मैश्वर्यवान् सिद्धिषु वासुदेव:॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
मृत्यु के भय से मुक्त हुए देवतागण इन्द्र के साथ उसका सामना करने के लिए आये, परन्तु युद्ध में नरकासुर को परास्त न कर सके। तब भगवान श्रीकृष्ण के आवश्यक बल, पराक्रम और अस्त्र-शस्त्रों को देखकर देवताओं ने उनसे उक्त डाकू नरकासुर का वध करने की प्रार्थना की और उसके दयालु तथा दुष्टों का दमन करने वाले स्वभाव को जानकर, तब समस्त कार्यों को सिद्ध करने में समर्थ भगवान श्रीकृष्ण ने उस कठिन कार्य को पूरा करना स्वीकार किया। 81-82॥
 
The gods, free from the fear of death, came with Indra to face him, but could not defeat Narakasura in the battle. Then, seeing the essential strength, bravery and weapons of Lord Shri Krishna, the gods requested him to kill the aforesaid dacoit Narakasura, and knowing his kind and evil-suppressing nature, then Lord Shri Krishna, who is capable of accomplishing all tasks, accepted to complete that difficult task. 81-82॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)