श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  5.48.22-23 
तृणप्रायं ज्वलनेनेव दग्धं
ग्रामं यथा धार्तराष्ट्रान् समीक्ष्य।
पक्वं सस्यं वैद्युतेनेव दग्धं
परासिक्तं विपुलं स्वं बलौघम्॥ २२॥
हतप्रवीरं विमुखं भयार्तं
पराङ्मुखं प्रायशोऽधृष्टयोधम्।
शस्त्रार्चिषा भीमसेनेन दग्धं
तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जब दुर्योधन देखेगा कि जैसे फूस की झोपड़ियों से बना हुआ गाँव आग से जलकर राख हो जाता है, वैसे ही धृतराष्ट्र के अन्य सब पुत्र भीमसेन के क्रोध से जलकर राख हो गए हैं, मेरी विशाल सेना बिजली से जली हुई पकी हुई फसल के समान नष्ट हो गई है, उसके प्रमुख योद्धा मारे गए हैं, सैनिकों ने पीठ फेर ली है, सब-के-सब भयभीत होकर रणभूमि से भाग गए हैं, प्रायः सभी योद्धाओं का साहस या दुस्साहस नष्ट हो गया है और भीमसेन के अस्त्रों की अग्नि से सब कुछ नष्ट हो गया है, तब उसे युद्ध करने का बहुत पछतावा होगा॥ 22-23॥
 
When Duryodhana sees that just like a village made of straw huts is reduced to ashes by fire, similarly all the other sons of Dhritarashtra have been burnt to ashes by Bhimasena's anger, my huge army has been destroyed like a ripe crop burnt by lightning, his main warriors have been killed, the soldiers have turned their backs, all have fled from the battlefield in fear, almost all the warriors have lost their courage or audacity and everything has been destroyed by the fire of Bhimasena's weapons, then he will regret the war very much.॥ 22-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)