श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना  »  श्लोक 106-107
 
 
श्लोक  5.48.106-107 
समाददान: पृथगस्त्रमार्गान्
यथाग्निरिद्धो गहनं निदाघे।
स्थूणाकर्णं पाशुपतं महास्त्रं
ब्राह्मं चास्त्रं यच्च शक्रोऽप्यदान्मे॥ १०६॥
वधे धृतो वेगवत: प्रमुञ्चन्
नाहं प्रजा: किंचिदिहावशिष्ये।
शान्तिं लप्स्ये परमो ह्येष भाव:
स्थिरो मम ब्रूहि गावल्गणे तान्॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
जैसे ग्रीष्म ऋतु में प्रज्वलित अग्नि वन को जला डालती है और कोई भी वृक्ष अछूता नहीं रहता, उसी प्रकार मैं भी अपने शत्रुओं का संहार करने के लिए सुसज्जित होकर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करूँगा, स्थूनाकर्ण, महान पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र तथा इन्द्र द्वारा प्रदत्त इन्द्रास्त्र का प्रयोग करूँगा तथा अपने तीव्र बाणों की वर्षा करूँगा, जिससे इस युद्ध में कोई भी जीवित न बचे। ऐसा करने से ही मुझे शांति मिलेगी। संजय! तुम उनसे स्पष्ट कहो कि यह मेरा दृढ़ एवं उत्तम निश्चय है। 106-107।
 
‘Just as a fire ignited in summer starts burning a forest, leaving no tree untouched, similarly, I will be equipped to kill my enemies, adopt various methods of handling weapons, use Sthunakarna, the great Pashupatastra, Brahmastra and the Indrastra given to me by Indra, and shower my rapid arrows, leaving no one alive in this war. Only by doing this will I find peace. Sanjaya! You tell them clearly that this is my firm and excellent determination. 106-107.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)