Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.48.101: मैं भी प्रमादरहित होकर मन से उसी प्रकार भविष्य को देखता हूँ। मेरी शाश्वत दृष्टि कभी लुप्त नहीं होती। इस प्रकार मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि धृतराष्ट्र के पुत्र युद्धभूमि में प्रवेश करने पर जीवित नहीं बच सकते॥101॥ | mahabharat अध्याय 5.48: संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अहं तथैवं खलु भाविरूपं
पश्यामि बुद्धॺा स्वयमप्रमत्त:।
दृष्टिश्च मे न व्यथते पुराणी
संयुध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति॥ १०१॥
अनुवाद
मैं भी प्रमादरहित होकर मन से उसी प्रकार भविष्य को देखता हूँ। मेरी शाश्वत दृष्टि कभी लुप्त नहीं होती। इस प्रकार मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि धृतराष्ट्र के पुत्र युद्धभूमि में प्रवेश करने पर जीवित नहीं बच सकते॥101॥
‘I myself too, being free from negligence, see the same form of future with my mind. My eternal vision never vanishes. According to that, I can say with certainty that Dhritarashtra's sons cannot survive when they enter the battlefield.॥ 101॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥