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mahabharat 5.46.26: जिस प्रकार चारों ओर जल का विशाल भण्डार भरा होने पर जल के लिए अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं रहती, उसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुष के लिए सम्पूर्ण वेदों में कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।   |   mahabharat अध्याय 5.46: परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.46.26 
यथोदपाने महति सर्वत: सम्प्लुतोदके।
एवं सर्वेषु वेदेषु आत्मानमनुजानत:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार चारों ओर जल का विशाल भण्डार भरा होने पर जल के लिए अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं रहती, उसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुष के लिए सम्पूर्ण वेदों में कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।
 
Just as there is no need to go anywhere else for water when there is a large reservoir of water filled all around, similarly, for a self-enlightened person, there remains nothing worth attaining in the entire Vedas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)