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श्लोक 5.46.24  |
नास्यातिवादा हृदयं तापयन्ति
नानधीतं नाहुतमग्निहोत्रम्।
मनो ब्राह्मी लघुतामादधीत
प्रज्ञां चास्मै नाम धीरा लभन्ते।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| इस ब्रह्मज्ञानी का हृदय निन्दा के वचनों से नहीं दुःखता। 'मैंने स्वयं अध्ययन नहीं किया, मैंने अग्निहोत्र नहीं किया' आदि बातें भी उसके मन में तुच्छ भावनाएँ उत्पन्न नहीं करतीं। ब्रह्मविद्या उसे शीघ्र ही वह स्थिर बुद्धि प्रदान कर देती है जो केवल धैर्यवान पुरुषों को ही प्राप्त होती है। योगीजन उस सनातन परमेश्वर को प्राप्त कर लेते हैं॥24॥ |
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| The heart of this Brahma-knower is not hurt by words of slander. Even things like 'I have not studied on my own, I have not performed Agnihotra' etc. do not create trivial feelings in his mind. Brahma-vidya soon gives him that steady intellect which only patient men get. Yogis realize that eternal God.॥24॥ |
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