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mahabharat 5.46.22: राजन! मैं कभी किसी के अनादर का पात्र नहीं हूँ। न मैं मरता हूँ, न जन्म लेता हूँ, फिर मोक्ष कौन और कैसे प्राप्त कर सकता है [क्योंकि मैं नित्य मुक्त ब्रह्म हूँ]। सत् और असत् सब कुछ मुझ सनातन समब्रह्म में स्थित है। मैं ही सत् और असत् का उद्गम स्थान हूँ। योगीजन उस सनातन परमेश्वर को, जो मेरा स्वरूप है, अनुभव करते हैं॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 5.46: परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 46: परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.46.22 
नाहं सदासत्कृत: स्यां न मृत्यु-
र्न चामृत्युरमृतं मे कुत: स्यात्।
सत्यानृते सत्यसमानबन्धे
सतश्च योनिरसतश्चैक एव।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
राजन! मैं कभी किसी के अनादर का पात्र नहीं हूँ। न मैं मरता हूँ, न जन्म लेता हूँ, फिर मोक्ष कौन और कैसे प्राप्त कर सकता है [क्योंकि मैं नित्य मुक्त ब्रह्म हूँ]। सत् और असत् सब कुछ मुझ सनातन समब्रह्म में स्थित है। मैं ही सत् और असत् का उद्गम स्थान हूँ। योगीजन उस सनातन परमेश्वर को, जो मेरा स्वरूप है, अनुभव करते हैं॥ 22॥
 
King! I am never the object of anyone's disrespect. Neither do I die nor do I take birth, then who can attain salvation and how [because I am the eternally liberated Brahma]. Everything, true and false, is situated in me, the eternal Sam-Brahma. I alone am the place of origin of truth and falsehood. Yogis realize that eternal God who is my form.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)