श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 46: परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.46.18 
एवंरूपो महात्मा स पावकं पुरुषो गिरन्।
यो वै तं पुरुषं वेद तस्येहार्थो न रिष्यते।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
ऐसा महान् आत्मा पुरुष अपने में भोगभाव को विलीन कर परमपिता परमेश्वर को जान लेता है। इस संसार में उसका उद्देश्य नष्ट नहीं होता (अर्थात् वह पूर्ण हो जाता है)। योगियों को उस सनातन परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाता है॥18॥
 
A person who is such a great soul, dissolves the feeling of being a enjoyer in himself and knows the Supreme God. His purpose in this world is not destroyed [i.e. he is fulfilled]. Yogis have a vision of that eternal God.॥18॥
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