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mahabharat 5.46.14: जो हंसरूपी भगवान् इस संसार सागर से ऊपर उठे हुए हैं, वे अपना एक पैर (संसार) ही नहीं उठा रहे हैं; यदि उसे भी उठा लें, तो सबके बंधन और मोक्ष सदा के लिए समाप्त हो जाएँ। योगीजन उस सनातन भगवान् का अनुभव करते हैं॥14॥   |   mahabharat अध्याय 5.46: परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 46: परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोंके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.46.14 
एकं पादं नोत्क्षिपति सलिलाद्धंस उच्चरन्।
तं चेत् संततमूर्ध्वाय न मृत्युर्नामृतं भवेत्।
योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जो हंसरूपी भगवान् इस संसार सागर से ऊपर उठे हुए हैं, वे अपना एक पैर (संसार) ही नहीं उठा रहे हैं; यदि उसे भी उठा लें, तो सबके बंधन और मोक्ष सदा के लिए समाप्त हो जाएँ। योगीजन उस सनातन भगवान् का अनुभव करते हैं॥14॥
 
The swan-like God, who is elevated above the ocean of this world, is not lifting just one of his feet (the world); if he lifts that too, then the bondage and liberation of all will end forever. Yogis experience that eternal God.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)