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mahabharat 5.45.8: चाहे सत्य हो या असत्य, ब्राह्मण को दूसरों की निन्दा करना उचित नहीं है। जो दूसरों की निन्दा करते हैं, वे अवश्य ही नरक में जाते हैं। 8.   |   mahabharat अध्याय 5.45: गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 45: गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.45.8 
सद् वासद् वा परीवादो ब्राह्मणस्य न शस्यते।
नरकप्रतिष्ठास्ते वै स्युर्य एवं कुर्वते जना:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
चाहे सत्य हो या असत्य, ब्राह्मण को दूसरों की निन्दा करना उचित नहीं है। जो दूसरों की निन्दा करते हैं, वे अवश्य ही नरक में जाते हैं। 8.
 
Whether it is true or false, it is not befitting for a Brahmin to criticize others. Those who criticize others surely go to hell. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)