Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.45.20: अतः मनुष्य को एकान्त में, समस्त कर्मों से रहित होकर, भजन करना चाहिए। मन को किसी भी प्रकार का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। स्तुति में आसक्ति और निन्दा में द्वेष नहीं करना चाहिए। ॥20॥ | mahabharat अध्याय 5.45: गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तूष्णीमेक उपासीत चेष्टेत मनसापि न।
तथा संस्तुतिनिन्दाभ्यां प्रीतिरोषौ विवर्जयेत्॥ २०॥
अनुवाद
अतः मनुष्य को एकान्त में, समस्त कर्मों से रहित होकर, भजन करना चाहिए। मन को किसी भी प्रकार का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। स्तुति में आसक्ति और निन्दा में द्वेष नहीं करना चाहिए। ॥20॥
Therefore, one should worship in solitude, being devoid of all activities. One should not allow the mind to make any effort. One should not have attachment in praise or hatred in criticism. ॥20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥