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mahabharat 5.45.2: राजेन्द्र! धीरे-धीरे मनुष्य एक-एक करके ये सब दुर्गुण प्राप्त कर लेते हैं और उनके वश में होकर मूर्ख मनुष्य पाप करने लगते हैं। 2॥   |   mahabharat अध्याय 5.45: गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 45: गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.45.2 
एकैकमेते राजेन्द्र मनुष्यान् पर्युपासते।
यैराविष्टो नर: पापं मूढसंज्ञो व्यवस्यति॥ २॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! धीरे-धीरे मनुष्य एक-एक करके ये सब दुर्गुण प्राप्त कर लेते हैं और उनके वश में होकर मूर्ख मनुष्य पाप करने लगते हैं। 2॥
 
Rajendra! Gradually, humans acquire all these vices, one after the other, and under their control, foolish humans start committing sins. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)