श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 45: गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.45.17 
संकल्पसिद्धं पुरुषमसंकल्पोऽधितिष्ठति।
ब्राह्मणस्य विशेषेण किञ्चान्यदपि मे शृणु॥ १७॥
 
 
अनुवाद
संकल्परहित अर्थात् कामनारहित पुरुष की अवस्था संकल्परूपी लक्ष्य को प्राप्त हुए पुरुष की अवस्था से भी ऊँची है; परन्तु ब्रह्मवेत्ता की अवस्था उससे भी अधिक विशेष है। इसके अतिरिक्त मैं तुमसे एक और बात कहता हूँ, सुनो॥17॥
 
The state of a person free from resolutions, that is, a person without desires, is higher than that of a person who has achieved the goal of resolution; but the state of a knower of Brahman is even more special than that. Apart from this, I will tell you one more thing, listen.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)