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mahabharat 5.44.7: जो पुरुष वर्तमान अवस्था में रहते हुए समस्त इच्छाओं को जीत लेते हैं और ब्राह्मी अवस्था को प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के संघर्षों को सहन करते हैं, वे सत्वगुण में स्थित होकर यहीं (विवेक के द्वारा) आत्मा को शरीर से ऐसे अलग कर लेते हैं जैसे बाँस से तिनका अलग कर दिया जाता है।   |   mahabharat अध्याय 5.44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.44.7 
अस्मिँल्लोके वै जयन्तीह कामान्
ब्राह्मीं स्थितिं ह्यनुतितिक्षमाणा:।
त आत्मानं निर्हरन्तीह देहा-
न्मुञ्जादिषीकामिव सत्त्वसंस्था:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष वर्तमान अवस्था में रहते हुए समस्त इच्छाओं को जीत लेते हैं और ब्राह्मी अवस्था को प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के संघर्षों को सहन करते हैं, वे सत्वगुण में स्थित होकर यहीं (विवेक के द्वारा) आत्मा को शरीर से ऐसे अलग कर लेते हैं जैसे बाँस से तिनका अलग कर दिया जाता है।
 
Those who, while living in the present state, conquer all desires and endure various kinds of conflicts just to achieve the Brahmi state, being situated in the Sattva Guna, separate the soul from the body here itself (through discrimination) like a straw is separated from the bamboo.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)