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mahabharat 5.44.6: सनत्सुजात ने कहा, "जो लोग आचार्य के आश्रम में प्रवेश करते हैं, उनकी सेवा करके उनके अंतरंग भक्त बनते हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे यहीं शास्त्रों के रचयिता बन जाते हैं और मृत्यु के बाद योगरूपी परमपद को प्राप्त होते हैं।"   |   mahabharat अध्याय 5.44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.44.6 
सनत्सुजात उवाच
आचार्ययोनिमिह ये प्रविश्य
भूत्वा गर्भे ब्रह्मचर्यं चरन्ति।
इहैव ते शास्त्रकारा भवन्ति
प्रहाय देहं परमं यान्ति योगम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
सनत्सुजात ने कहा, "जो लोग आचार्य के आश्रम में प्रवेश करते हैं, उनकी सेवा करके उनके अंतरंग भक्त बनते हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे यहीं शास्त्रों के रचयिता बन जाते हैं और मृत्यु के बाद योगरूपी परमपद को प्राप्त होते हैं।"
 
Sanatsujata said, "Those who enter the ashram of an Acharya, become his intimate devotees by serving him and observe celibacy, they become authors of scriptures here itself and after death they attain the Supreme Being in the form of Yoga." 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)