श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.44.4 
सनत्सुजात उवाच
अव्यक्तविद्यामभिधास्ये पुराणीं
बुद्धॺा च तेषां ब्रह्मचर्येण सिद्धाम्।
यां प्राप्यैनं मर्त्यलोकं त्यजन्ति
या वै विद्या गुरुवृद्धेषु नित्या॥ ४॥
 
 
अनुवाद
सनत्सुजातजी बोले - अब मैं (सच्चिदानन्दघन) अव्यक्त ब्रह्म से सम्बन्ध रखने वाले उस प्राचीन ज्ञान का वर्णन करूँगा, जो बुद्धि और ब्रह्मचर्य के द्वारा मनुष्यों को प्राप्त होता है, जिसे पाकर विद्वान पुरुष इस नश्वर शरीर को सदा के लिए त्याग देते हैं और जो वृद्ध गुरुजनों में सदैव विद्यमान रहता है॥4॥
 
Sanatsujatji said - Now I (Sachchidanandaghan) will describe that ancient knowledge related to the unmanifested Brahma, which is attained by humans through intelligence and celibacy, after attaining which the learned men leave this mortal body forever and which is always present in the old gurus. 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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