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श्लोक 5.44.31  |
अनामयं तन्महदुद्यतं यशो
वाचो विकारं कवयो वदन्ति।
यस्मिन् जगत् सर्वमिदं प्रतिष्ठितं
ये तद् विदुरमृतास्ते भवन्ति॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| विद्वान लोग कहते हैं कि कार्यरूप जगत् तो केवल वाणी का विकृत रूप है; परंतु जिस ब्रह्म में यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है, वह रोग, शोक और पाप से रहित है और उसका महान यश सर्वत्र व्याप्त है। जो लोग उस सनातन कारणरूप ब्रह्म को जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात् मुक्त हो जाते हैं॥ 31॥ |
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| The learned say that the world of effect is only a distortion of speech; but the Brahma in whom this entire world is situated is free from disease, sorrow and sin and his great fame is spread everywhere. Those who know that eternal cause-form Brahma become immortal i.e. get liberated.॥ 31॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि सनत्सुजातवाक्ये चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्सुजातपर्वमें सनत्सुजातवाक्यविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४॥
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