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mahabharat 5.44.26: सनत्सुजात बोले - यद्यपि श्वेत, लाल, काले, लोहे के समान अथवा सूर्य के समान प्रकाशमान अनेक प्रकार के रूप प्रकट होते हैं, तथापि ब्रह्म का वास्तविक रूप न तो पृथ्वी में है और न आकाश में। यहाँ तक कि समुद्र का जल भी उस रूप को धारण नहीं करता। 26॥   |   mahabharat अध्याय 5.44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  5.44.26 
सनत्सुजात उवाच
आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो
कृष्णमायसमर्कवर्णम्।
न पृथिव्यां तिष्ठति नान्तरिक्षे
नैतत् समुद्रे सलिलं बिभर्ति॥ २६॥
 
 
अनुवाद
सनत्सुजात बोले - यद्यपि श्वेत, लाल, काले, लोहे के समान अथवा सूर्य के समान प्रकाशमान अनेक प्रकार के रूप प्रकट होते हैं, तथापि ब्रह्म का वास्तविक रूप न तो पृथ्वी में है और न आकाश में। यहाँ तक कि समुद्र का जल भी उस रूप को धारण नहीं करता। 26॥
 
Sanatsujata said – Although many types of forms appear, white, red, black, like iron or luminous like the sun, yet the real form of Brahma is neither in the earth nor in the sky. Even the ocean water does not take that form. 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)