श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.44.25 
धृतराष्ट्र उवाच
आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो
कृष्णमथाञ्जनं काद्रवं वा।
सद्‍ब्रह्मण: पश्यति योऽत्र विद्वान्
कथं रूपं तदमृतमक्षरं पदम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "विद्वान पुरुष यहाँ जो ईश्वर के अमर और सनातन स्वरूप को देख रहे हैं, उसका स्वरूप क्या है? क्या वह श्वेत, लाल, काजल के समान काला अथवा स्वर्ण के समान पीला दिखाई देता है?"
 
Dhritarashtra said, "What is the form of the immortal and eternal Supreme State of the true form of God that the learned men see here? Does it appear white, red, black like mascara or yellow like gold?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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