| श्री महाभारत » पर्व 5: उद्योग पर्व » अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण » श्लोक 22 |
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| | | | श्लोक 5.44.22  | आकाङ्क्ष्यार्थस्य संयोगाद् रसभेदार्थिनामिव।
एवं ह्येते समाज्ञाय तादृग्भावं गता इमे॥ २२॥ | | | | | | अनुवाद | | जैसे रसभेदरूपी चिंतामणि का भजन करनेवाले मनुष्य अभीष्ट वस्तु प्राप्त करते हैं, वैसे ही ब्रह्मचर्य भी अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है। ऐसा समझकर इन ऋषियों और देवताओं आदि ने ब्रह्मचर्य का पालन करके उसी गति को प्राप्त किया॥ 22॥ | | | | Just as those who pray to the Chintamani, which is in the form of Rasbheda, get their desired object, similarly celibacy also provides the desired object. Understanding this, these sages and gods etc. got the same state by observing celibacy.॥ 22॥ | | ✨ ai-generated | | |
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