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श्लोक 5.44.21  |
गन्धर्वाणामनेनैव रूपमप्सरसामभूत्।
एतेन ब्रह्मचर्येण सूर्योऽप्यह्नाय जायते॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| इसी ब्रह्मचर्य के प्रभाव से गंधर्वों और अप्सराओं को दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ। इसी ब्रह्मचर्य के प्रताप से सूर्यदेव समस्त लोकों को प्रकाशित करने में समर्थ हैं। |
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| Due to this effect, Gandharvas and Apsaras attained divine form. It is due to the glory of this celibacy that the Sun God is able to illuminate all the worlds. |
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