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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 44: ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.44.17 
धर्मादयो द्वादश यस्य रूप-
मन्यानि चाङ्गानि तथा बलं च।
आचार्ययोगे फलतीति चाहु-
र्ब्रह्मार्थयोगेन च ब्रह्मचर्यम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
कहा जाता है कि जिसका स्वरूप ऊपर वर्णित बारह गुणों का है तथा जिसमें धर्म के अन्य अंग और शक्तियां भी हैं, वह ब्रह्मचारी आचार्य के संबंध से प्राप्त वेदार्थ के ज्ञान से सफल हो जाता है।
 
It is said that the one whose form is the twelve virtues mentioned above and who also have other parts and powers of religion, becomes successful through the knowledge of Vedartha obtained from the relationship with a celibate Acharya.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)